साक्षात्कारः योग विशेषज्ञ डॉ. विनोद कुमार से समझें जीवन में योग का महत्व

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सिर्फ एक घंटा योगाभ्यास करके शरीर को स्वस्थ, मन को शांत व तनाव मुक्त रखा जा सकता है। योग पर हालिया रिसर्च बताती है कि मस्तिष्क में टेंशन और अशांति उत्पन्न करने वाला ‘कॉर्टिसोल’ हार्मोन के स्राव को सिर्फ योग से ही नियंत्रित किया जा सकता है।

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कोरोना के चलते दूसरी मर्तबा विश्व योग दिवस डिजिटल तरीके से मनाया जा रहा है। सामान्य दिनों और संकटकाल, दोनों में योग विधाओं ने कितना अंतर महसूस किया। साथ ही कोरोना में योगासन कितने कारगर साबित हुए जैसे तमाम मसलों पर दिल्ली स्थित आदर्श योग केंद्र के प्रमुख और योग विज्ञान संस्थान के शिक्षक व जानेमाने योग एक्सपर्ट डॉ. विनोद कुमार से डॉ. रमेश ठाकुर ने विश्व योग दिवस के मौके पर की विशेष बातचीत। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश-

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प्रश्न- क्या योगासन में कोई ऐसी विधि है, जो कोरोना जैसे वायरस का रोधक हो?

उत्तर- योग का प्रत्येक आसन इम्युनिटी को बढ़ाता है। योग का मात्र एक आसन कई रोगों से मुक्ति दिलाने का मादा रखता है। डिप्रेशन, पैनिक अटैक, एंग्जाइटी व अनिद्रा जैसी मानसिक बीमारियों का तो काल है योगा। लेकिन इस बात की रिसर्च जारी है कि वास्तविक रूप से ऐसा कौन-सा आसन है जो वायरसों से भी मुक्ति दिला सके। देखिए मौजूदा माहौल कुछ चिंताओं, अकेलेपन, अनिश्चितता व आशंकाओं से भरा है। सबसे पहले चुनौती इस बात की है कि हम अपने मन को कैसे शांत रखें और तन को कैसे हृष्ट पुष्ट रख पाएं।

प्रश्न- शरीर को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना न्यूनतम कितना योग करना चाहिए?

उत्तर- सिर्फ एक घंटा योगाभ्यास करके शरीर को स्वस्थ, मन को शांत व तनाव मुक्त रखा जा सकता है। योग पर हालिया रिसर्च बताती है कि मस्तिष्क में टेंशन और अशांति उत्पन्न करने वाला ‘कॉर्टिसोल’ हार्मोन के स्राव को सिर्फ योग से ही नियंत्रित किया जा सकता है। कुछ रोग दवाइयों से नहीं, योग से दूर होते हैं। हमें इतना मानकर चलना चाहिए, बिना योग के बेहतर स्वास्थ्य, मानसिक शांति और मुक्ति संभव नहीं है।

प्रश्न- आपको नहीं लगता योग को आधिकारिक रूप से मान्यता बहुत देरी से मिली?

उत्तर- बिल्कुल सच है। बीते कुछ वर्षों से ही योग को आधिकारिक रूप से मान्यता मिल पाई है। नहीं मिलने का नुकसान मानव को बहुत उठाना पड़ा। वैदिक ऋषियों ने वर्षों की तप-साधना के बाद यह महसूस किया कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर ऐसी संजीवनी शक्ति मौजूद है जो शरीर के रोगों का तो नाश करती ही है, बल्कि मानसिक विकारों पर भी लगाम कसती है। योग-साधना वैदिक युग से चली आ रही है, ऋषि-मुनियों द्वारा विकसित इस अनूठी प्रणाली को हाल के बीस-पच्चीस वर्षों में दुनिया भर में नई पहचान और प्रतिष्ठा मिली है।

प्रश्न- ऐसा क्यों है कि हिंदुस्तान में योग को आगे बढ़ाने का ठेका एकाध लोगों ने ही लिया हुआ है?

उत्तर- योग किसी व्यक्ति विशेष से बंधा हुआ नहीं है, योग तो सभी के लिए है और सारे विश्व के लिए है। 2015 से लेकर हर साल 21 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 2014 में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पास किया, जिसे 177 देशों ने बिना वोटिंग के स्वीकारा। ये सच है कि मान्यता के बाद ही दुनिया ने योग की महत्ता को समझा है। बीते वर्ष की भांति इस साल भी कोविड-19 की वजह से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगा।

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प्रश्न- योग दिवस पर सिर्फ रस्म अदायगी होती है, फोटो खिंचवाने तक सीमित रहते हैं लोग, इससे क्या भला होगा?

उत्तर- योग दिवस पर हम लोगों को विभिन्न मुद्राओं में प्रैक्टिस व फिजिकल वर्कआउट कराते हैं। लोग समझते हैं कि आसन और प्राणायाम ही योग है। असलियत में देखा जाए तो ये योग नहीं, बल्कि योग तक पहुंचने के उपाय हैं। वेदों, उपनिषदों व गीता में योग का विशद वर्णन है। लेकिन महर्षि पतंजलि के योगसूत्र में योग को सटीक ढंग से परिभाषित किया है। ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध’ यानी आसनों का अभ्यास नहीं, बल्कि चित्त पर पड़े विकारों के शोधन की प्रक्रिया ही योग है।

प्रश्न- कोरोना ने पूरी दुनिया को अस्वस्थ कर दिया है, स्वस्थ जीवन के लिए योग किस तरह की भूमिका निभाएगा?

उत्तर- बीते पांच-सात वर्षों में तकरीबन तीस करोड़ से ज्यादा लोगों को आर्थिक दुर्बलता से योग बाहर निकाल लाया था। किंतु कोरोना के कहर ने मेहनत पर पानी फेर दिया है। कोरोना महामारी से उपजी कठिन परिस्थितियों के बीच भारत समेत दुनिया के तमाम देशों को दोबारा से अपने नागरिकों को उनकी जीवनशैली व आजीविका के बीच समन्वय व सामंजस्य स्थापित करना होगा है। वर्चुअल वर्ल्ड के इस दौर में मन का नया रोग ‘डिजिटल इगो’ एक जटिल आकार ग्रहण कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में खासतौर पर कोविड-19 की कालावधि में लोगों की वर्चुअल स्पेस पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।

प्रश्न- कोरोना की तीसरी लहर की संभावनाओं ने अभिभावकों को डरा रखा है?

उत्तर- यूनिसेफ द्वारा किए गए सर्वेक्षण में बच्चों और किशोरों में मानसिक अस्थिरता, संशय, स्मृति भ्रंश, उन्माद, स्लीप डिस-ऑर्डर आदि मानस रोगों में चिंताजनक वृद्धि हुई है। डेढ़ वर्ष से विद्यालयों द्वारा ऑनलाइन शिक्षा दी जा रही है। इस अरूचिकर व मशीनी शिक्षा-प्रणाली से बच्चे बेहद चिड़चिड़े व अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) से ग्रस्त हो गए हैं। यदि ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से बच्चों को यौगिक क्रियाएं कराई जाएं तो निश्चित रूप से इसके सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे और विद्यार्थियों के व्यक्तित्व में असाधारण बदलाव लाया जा सकता है।

प्रश्न- बाबा रामदेव की लोगों को योग करने और काढ़े का सेवन की सलाह कितनी जायज है?

उत्तर- योग विज्ञान, आयुर्वेदिक इम्यूनिटी-बूस्टर काढ़ा और नेचुरोपैथी यानी टॉक्सिक्स विरेचन पद्धति ने समूचे विश्व को विकट समस्या से उबारने में निश्चित रूप अच्छी भूमिका निभाई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग का प्रचार-प्रसार इस वजह से भी हो रहा है कि अच्छे स्वास्थ्य से लेकर मनुष्य को बंधुत्व भाव से जोड़ने तक इसके व्यापक सकारात्मक प्रभाव भी दिखाई दें। कुल मिलाकर हमें योग के महत्व का प्रचार करते रहना है।

-जैसा रमेश ठाकुर से योग एक्सपर्ट डॉ. विनोद कुमार ने कहा।

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