श्रद्धालु भगवान विट्ठल को श्री कृष्ण का ही रूप मानते हैं

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भारतवर्ष श्रद्धा और ज्ञान की भूमि है। यहां के देवता शास्त्र नहीं, बल्कि भक्तों की श्रद्धा से स्थापित होते हैं। विट्ठल पांडुरंग भगवान उन्हीं में से एक हैं। वे महाराष्ट्र के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक और अग्रगण्य हैं। अपने क्षेत्रीय पहचान में भी वे राष्ट्रीय फलक से सम्बद्ध हैं। वे अपने दोनों हाथ कमर पर रख एक ईंट पर खड़े होते हैं। ईंट को क्षेत्रीय मराठी भाषा में वीट कहते हैं, जिससे विट्ठल नाम आता है। 

बता दें कि उनकी जनप्रियता अलौकिक है। उनके दर्शन करने के लिए प्रति वर्ष हर लाखों वारकरी या तीर्थयात्री उनसे जुड़े आराध्यस्थल पंढरपुर की यात्रा करते हैं, जिसे वारी कहते हैं। इस यात्रा के दौरान उनके प्रति आस्थावान महिलाएं अपने सिर पर विट्ठल का पवित्र तुलसी का पौधा रखती हैं और वीरोचित पुरुष संतों के गीत गाये जाते हैं ।

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सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, 13 वीं सदी में प्रख्यात संत ज्ञानेश्वर से लेकर आज तक के ज़्यादातर श्रद्धालु भगवान विट्ठल को भगवान श्री कृष्ण का रूप मानते और पूजते आए हैं। हालांकि, पारंपरिक वैदिक मान्यताएं या पौराणिक ग्रंथ इससे सहमत नहीं हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, क्षेत्रीय लेखक व सामाजिक चिंतक रामचंद्र चिंतामन ढेरे ने भगवान विट्ठल की परंपराओं पर गहन अध्ययन किया है। उनके अनुसार, लगभग एक हज़ार वर्ष पहले भगवान विट्ठल संभवतया एक ग्रामीण देवता थे, जिनकी पूजा स्थानीय गाय-भैंस-बकरी चराने वाले चरवाहे करते थे। इसलिए भगवान विट्ठल को भगवान श्री कृष्ण के साथ जोड़ा गया, जो एक हद तक सही भी है। 

उपलब्ध साक्ष्यों के मुताबिक, संभवतः भगवान विट्ठल को भगवान श्रीकृष्ण के साथ जोड़ने के लिए देवगिरी (आधुनिक काल का दौलताबाद) के यादव राजाओं ने प्रोत्साहित किया। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के वंशज होने का दावा किया। वे मराठी भाषा के सहायक थे। उनके शासनकाल में 8 वीं से 13 वीं सदी तक जो ‘वीर’ पत्थर स्थापित किए गए, उसका मकसद था स्थानीय वीरों को देवता मानकर पूजा जाना। उनका यह अनुप्रयोग बेहद सफल रहा। समझा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण या किसी और देवी-देवता के साथ जोड़े जाने से पहले भगवान विट्ठल की छवि भी शायद किसी शुरवीर की छवि की तरह ही रही होगी।

आम तौर पर भगवान श्री कृष्ण या भगवान विष्णु की छवियों में एक पैर उनके ही दूसरे पैर पर रखा होता है। या फिर उनके हाथ में बांसुरी होती है। लेकिन भगवान विट्ठल की छवि में यह अमूमन दिखाई नहीं देता है। इस जनप्रिय देवता की विशेष मछली के आकार की बालियां भगवान श्री कृष्ण या फिर भगवान श्री विष्णु के साथ उनका संबंध स्थापित करने का एकमात्र प्रतीक है। इसके बावजूद वे अपने भक्तों के लिए भगवान श्रीकृष्ण हैं।

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लोक मान्यताओं के मुताबिक, पंढरपुर के आस-पास भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के गीत बेहद लोकप्रिय व प्रसिद्ध हैं, जिनमें वे अपनी मां यशोदा के साथ समय बिताते हैं या फिर यमुना नदी के किनारे गायों पर निगहबानी रखते हैं। इसके पास में उनकी पत्नी रुक्मिणी का भी एक मंदिर है, जिन्हें यहां के लोग रुखुमाई कहते हैं। बता दें कि गोकुल और अपने चरवाहे का जीवन पीछे छोड़ने के कई वर्षों के बाद भगवती रुक्मिणी, भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में आई थीं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि कैसे हिंदू धर्म में शास्त्र भगवान की स्थापना नहीं करते, बल्कि उनकी स्थापना भक्तों की श्रद्धा व विश्वास और उस पर आधारित उनकी मान्यताओं से होती है ।

इससे भी रोचक बात यह है कि महाराष्ट्र के ज़्यादातर कवि-संत, जैसे ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, जनाबाई और तुकाराम, भगवान विट्ठल को विठोबा अर्थात पिता ही नहीं, बल्कि विठाई यानी माता भी मानते थे। यह अपने आपमें अद्भुत, अलौकिक और अविस्मरणीय बात है। उनके प्रति जनमानस की निवेदित श्रद्धा ही उन्हें सबसे प्रसिद्ध बनाकर लोकमानस में उन्हें स्थापित करती है।

सुप्रसिद्ध संत ज्ञानेश्वर द्वारा भगवद् गीता पर लिखे गए भाष्य ‘ज्ञानेश्वरी’ में जब भगवान श्रीकृष्ण धनुर्धर अर्जुन के सामने अपने सर्वव्यापी रूप में प्रकट होते हैं, तब वीर अर्जुन भगवान श्री कृष्ण को अपना मित्र नहीं मानते या उनके भक्त के रूप में पेश नहीं आते, बल्कि वे भगवान श्रीकृष्ण को सर्वव्यापी माता के रूप में देखते हैं, जो स्नेही और कोमल हैं। इस प्रकार भक्त भगवान की स्पष्ट रूप से पुरुष वाली छवि होने के बावजूद अपनी कल्पना में उन्हें स्त्री रूप में देखना पसंद करता है। 

हिंदू धर्म व संस्कृति में देवियों की कोई कमी नहीं है। पश्चिमी भारत के महाराष्ट्र में मां दुर्गा, मां काली और मां गौरी की स्थानीय अभिव्यक्तियों को समर्पित कई मंदिर हैं। वे सुप्रसिद्ध व अपने दृष्टिकोण में सर्वव्यापी हैं। लेकिन विठाई इनसे अलग हैं। वे कतई उग्र नहीं हैं। वे खून की बलि नहीं मांगतीं। वे असुरों को नहीं मारतीं। वे बच्चों को बुखार से पीड़ित नहीं करतीं। वे प्रसन्न नहीं किए जाने पर गर्भपात या महामारी की वजह नहीं बनतीं हैं। बल्कि वे स्नेहमयी हैं, किसी का पोषण करने और किसी को भी क्षमा करने के लिए सदा तैयार हैं। कमोबेश वे उस मादा कछुए के समान हैं जो छोटे बच्चों को पालती है या उस गाय के समान है, जो अपने भयभीत बछड़े को दूध देने के लिए ही पहाड़ चढ़ती है।

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सच कहा जाए तो भगवान का प्रेम उनके जेंडर यानी लिंग से ज़्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है। कम से कम धार्मिक मामलों में तो ऐसा ही है। लेकिन आधुनिक भारत के सामाजिक और कानूनी मामलों में इसे कतई स्वीकार नहीं किया जाता है। अमूमन, पिताओं को माता की भूमिका में या माताओं को पिता की भूमिका में यानी उसे निभाते हुए नहीं देखा जा सकता है। मतलब, किसी घर में सिर्फ पुरुष का वर्चस्व हो सकता है, स्त्री का नहीं। हमें बताया जाता है कि लिंग को लेकर यह सख्ती ही हमारी ‘सच्ची’ संस्कृति है। लेकिन यह स्पष्ट है कि प्रेम में डूबे हुए देवता और संत इससे असहमत हैं। पंढरपुर स्थित श्री रुक्मिणी मंदिर की कतिपय छवियों से भी इसकी पुष्टि होती है। भारतीय सनातन धर्म और हिन्दू संस्कृति की सर्वव्यापकता के मूल में भी यही भाव अंतर्निहित है, जिसकी कद्र की जानी चाहिए, तर्क वितर्क नहीं।

– कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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