अमेरिका जाने वाले अफगान शरणार्थी कौन हैं, भारत में किसी नागरिक को शरण देने का सिस्टम क्या है?

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अपने इतिहास के सबसे लंबे युद्ध से पीठ दिखाकर अमेरिका वापस लौट चुका है और अपने पीछे कई तस्वीरें भी छोड़ गया है जिससे हम बीते कुछ दिनों से आए दिन दो चार हो रहे हैं। काबुल से अमेरिकी विमान ने उड़ान भऱी और अफगान नागरिकों का हुजूम हाथ ऊठाए उस पर चढ़ने को टूट पड़ा। खौफजदा अफगान महिलाएं अपने बच्चों को सैनिकों को सौंप रही हैं, इस उम्मीद में कि शायद वो इस नरक से बाहर निकल सकें। देश छोड़ने के लिए कई लोग विमान के पहिए पर भी बैठ गए थे। कुछ लोगों को विमान के ऊपर भी देखा गया था। सभी लोग अपना-अपना शहर, अपना घर छोड़कर भागने लगे और दूसरे देशों में शरण लेने पर मजबूर हैं। अपने देश से निकलने की ऐसी जल्दी दिखी कि जिसे जहां जो जगह मिली वो उधर ही भागता दिखा। लोग प्लेन के पहियों तक पर लटक गए। इससे पहले 1996 के तालिबान शासन के शुरू होने के बाद भी अफगान लोगों को देश छोड़ते हुए देखा गया था। 2001 में अमेरिका ने नाटो सेनाओँ के साथ अफगानिस्तान में एंट्री ली और तालिबान को पीछे ढकेला। इसके बावजूद दूर-दराज के इलाकों में तालिबान ने कहर बरपाए रखा। इसलिए कम मात्रा में ही सही लोग अफगानिस्तान से पलायन करते रहे। अब तो अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने के बाद दुनिया के कई देशों में अफगान शरणार्थियों की बाढ़ सी आ गई है। 

अमेरिकी सेना अफगानों को क्यों निकाल रही है?

तालिबान के लगातार बढ़ते हमलों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने बड़ा फैसला लिया। जिन इलाकों में तालिबान की ज्यादा हिंसा की वजह से अफगान नागरिक खतरे में पड़े, उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने का कार्यक्रम बाइडेन प्रशासन की तरफ से जारी रखा गया। तालिबान की बढ़ी हिंसा की वजह से अमेरिकी सरकार उन लोगों को शरणार्थी का दर्जा देने की तैयारी कर रहा है, जो अमेरिकी सरकार के साथ काम कर रहे थे। इन लोगों ओर उनके परिवारों के लिए यूएस रिफ्यूजी एडमिशन प्रोग्राम (US Refugee Admissions Program) में ही ‘प्राइरिटी-2’ कैटेगरी बनाने की तैयारी है। 

विशेष अप्रवासी वीजा कार्यक्रम क्या है?

अफगान स्पेशल इमिग्रेंट वीजा एप्लीकेशंस के पहले ग्रुप में अधिकतर वे लोग हैं, जो अमेरिकी सैनिकों या राजनयिकों के लिए ट्रांसलेटर का काम किया करते थे। अफगानिस्तान और इराक में SIV आवेदकों की वकालत करने वाले एक समूह, एसोसिएशन ऑफ वॉरटाइम अलायंस द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुमानित 5,000 SIV आवेदकों को पहले ही अफगानिस्तान से निकाला जा चुका है। समूह का अनुमान है कि 65,000 SIV आवेदक और परिवार के सदस्य अफगानिस्तान में रहते हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका में आने वाले अफगान कौन हैं?

पेंटागन के अनुसार काबुल से अमेरिकी सैन्य निकासी उड़ानों ने अमेरिकी नागरिकों, वैध स्थायी निवासियों, अफगान SIV आवेदकों और अन्य अफगानों को ले जाया गया। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश करने वाले अफगानों में अनुमोदित SIV वाले लोग और इसके आवेदक हैं। अन्य आने वाले अफगान अमेरिकी शरण या इसी तरह के राहत की मांग कर सकते हैं। अफ़ग़ान जिनके पास संयुक्त राज्य में आने पर वैध आप्रवासन स्थिति की कमी है, उन्हें “मानवीय पैरोल” के माध्यम से अस्थायी अवधि के लिए प्रवेश करने की अनुमति दी जा सकती है।

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अफ़गानों के संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंचने पर क्या होता है?

अमेरिकी निकासी उड़ानें अब तक वर्जीनिया के डलेस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरी हैं। COVID-19 के परीक्षण के बाद अमेरिकी नागरिक और वैध स्थायी निवासी अपने गंतव्य पर जा सकते हैं। प्रक्रिया से परिचित लोगों के अनुसार, SIV-योग्य अफगान और अन्य अफगान आगमन प्रसंस्करण के लिए वर्जीनिया, टेक्सास, विस्कॉन्सिन और न्यू जर्सी में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जाते हैं। सैन्य ठिकानों पर भेजे गए अफगानों को अन्य सेवाओं के साथ स्वास्थ्य जांच और कार्य प्राधिकरण के लिए आवेदन करने में मदद मिलती है। वर्जीनिया में फोर्ट ली में काम करने वाले एक शरणार्थी कर्मचारी ने रायटर को बताया कि प्रसंस्करण में एक दिन से लेकर एक सप्ताह या उससे अधिक समय लग सकता है। एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि सैन्य ठिकानों पर प्रसंस्करण के बाद, अफगानों को एक अमेरिकी शरणार्थी पुनर्वास संगठन से जोड़ा जाएगा।

क्या संभावित सुरक्षा खतरों के लिए आने वाले अफगानों की जांच की जा रही है?

SIV के लिए आवेदन करने वाले अफगानों को एक 14-चरणीय आवेदन प्रक्रिया पूरी करनी होगी जिसमें एक वीज़ा साक्षात्कार और सुरक्षा जांच शामिल है। बाइडेन प्रशासन ने कहा है कि SIV आवेदकों को बाद में आवेदन प्रक्रिया में अमेरिका में प्रवेश करने की अनुमति दी गई है। वरिष्ठ प्रशासन अधिकारी के अनुसार पहले चरण में आवेदकों को कतर, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और जर्मनी सहित तीसरे देशों में भेजा जा रहा है। उन देशों में, अफगान “मजबूत सुरक्षा प्रसंस्करण” से गुजरते है। इस प्रक्रिया में खुफिया, कानून प्रवर्तन, और आतंकवाद विरोधी पेशेवरों द्वारा आयोजित बायोमेट्रिक और जीवनी सुरक्षा जांच शामिल है, जो इन सभी अफगानों को संयुक्त राज्य में अनुमति देने से पहले चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं।

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शरणार्थियों का दबाव

अफगानिस्तान दुनिया के उन देशों में शुमार है जिनके नागरिक बड़ी संख्या में दुनिया के दूसरे देशों में शरण ले चुके हैं। यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजीस के अनुसार, साल 2020 तक 28 लाख अफगान शरणार्थी दुनिया के अलग-अलग देशों में शरण लेकर रह रहे हैं। इस मामले में सीरिया सबसे आगे है. वहां के 68 लाख लोग शरणार्थी के रूप में दूसरे देशों में रह रहे हैं। 

अफगानी नागरिक भारत की ओर करते रुख 

अफगानिस्तान के मौजूदा संकट के चलते दुनियाभर के बाकी देशों की तरह भारत पर भी शरणार्थियों को लेने का दवाब बना हुआ है। ज्यादातर लोग पैदल या सड़क के रास्ते सीमावर्ती पाकिस्तान, ईरान और अलबानिया के साथ ही भारत की तरफ भी बढ़ रहे हैं। आम नागरिक ही नहीं कई खास लोग भी देश छोड़कर भारत का रूख कर चुके हैं। जुलाई 2021 तक भारत में यूएनएचसीआर  के पास 15467 अफगान शरणार्थी रजिस्टर्ड हैं। जानकारों का मानना है कि अफगानिस्तान से भारत में शरण मांगने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा होगा। इधर भारत सरकार दो तरह से अफगान नागरिकों के भारत में आने या बने रहने की समस्या से निपट रही है। अफगानिस्तान को ई-वीजा कैटेगरी में डाला गया। ”ई-आपातकालीन एक्स-विविध वीजा” नामक इलेक्ट्रॉनिक वीजा की एक नई श्रेणी को भारत में प्रवेश के लिए वीजा आवेदनों को फास्ट-ट्रैक करने के लिए पेश किया गया है।  गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि इन सभी आवेदनों को पहले सुरक्षा एजेंसियों द्वारा मंजूरी दी जाएगी। एमएचए की वीज़ा नीति के अनुसार, किसी ऐसे उद्देश्य के लिए वीज़ा के लिए आवेदन करने वाले विदेशी नागरिक, जो विशेष रूप से किसी वीज़ा श्रेणी के अंतर्गत नहीं आते हैं, उन्हें उचित अवधि के लिए ‘एक्स-विविध’ वीज़ा प्रदान किया जा सकता है। एक्स-विविध वीजा पर गृह मंत्रालय के नीति दस्तावेज के अनुसार यदि वीजा 180 दिनों से अधिक की अवधि के लिए दिया जाता है, तो विदेशी को आगमन के 14 दिनों के भीतर संबंधित एफआरआरओ/एफआरओ में अपना पंजीकरण कराना होगा। यह वीजा गैर-विस्तार योग्य और किसी अन्य प्रकार के वीजा के लिए गैर-परिवर्तनीय होगा।

क्या है शरण देने का सिस्टम?

जहां तक बात दूसरे देशों के नागरिकों को भारत में शरण देने की है तो इसमें सबसे बड़ी चुनौती केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारों को लेकर है। कानून व्यवस्था राज्य का विषय होता है, जबकि नागरिकता केंद्र सरकार का विषय है। जिसकी वजह से ये मामला लंबा खिंचता है। जैसे म्यांमार के मामले में वहां से आने वाले शरणार्थी पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में आ रहे हैं। ऐसे में किसी भी तरह की गड़बड़ ना हो इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार के जिम्मे है। लेकिन विदेशी नागरिकों से जुड़ा विषय होने की वजह से इसमें केंद्र सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है। यूनाइटेड नेशन ह्यूमन राइट कमीशन अपने देशों में परेशानी झेल रहे नागरिकों को दूसरे देशों में शरणार्थी के तौर पर बसाने के काम में ये संस्था मदद करती है। इसके ऑफिस भारत में दिल्ली और चेन्नई में हैं, जहां शरणार्थी आवेदन करते हैं। शरण मांगने वाले को ये दिखाना पड़ता है कि उसे अपने देश में बहुत खतरा है और वो हर हाल में अपना देश छोड़ने को मजबूर हैं। शरण मांगने वाले को ये सिद्ध करना होता है कि उसे उसकी जाति, धर्म, पहचान, राजनीतिक विचारधारा या किसी सामाजिक समूह का हिस्सा होने की वजह से उसके देश में परेशान किया जा रहा है। ये शर्तें पूरी करने के बाद शरण लेने वालों को यूनाइटेड नेशन हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजी के दिल्ली या चेन्नई ऑफिस जाकर रजिस्ट्रेशन कराना होता है। केस वेरीफिकेशन और केस नं, पासपोर्ट आदि डॉक्यूमेंट आदि लिए जाते हैं। 20 महीने के भीतर आवेदक का इंटरव्यू लिया जाता है। फिर उसके दावे को परखने के बाद सही पाए जाने पर उसे शरणार्थी का स्टेटस दे दिया जाता है। – अभिनय आकाश

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