काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: भाग-18

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माता हैं श्री जानकी, और पिता हैं राम
रघुनंदन हैं जिस जगह, वही अयोध्या धाम।
वही अयोध्या धाम, सुनो मेरे प्रिय लखना
इन दोनों का ध्यान, तुम्हें हर पल है रखना।
कह ‘प्रशांत’ वह माता सचमुच है बड़भागी
जिसका सुत हो सीता-राम चरण अनुरागी।।41।।
माता का आशीष पा, लक्ष्मण हुए निहाल
पहुंचे सीता-राम के, चरणों में तत्काल।
चरणों में तत्काल, गये दशरथ के धामा
तीनों ने मिल सादर कीन्हा उन्हें प्रणामा।
कह ‘प्रशांत’ थी राजा ने सुध-बुध बिसराई
कैसे कहें, यहीं रुक जाओ हे रघुराई।।42।।
जनता उमड़ी थी वहां, सब थे बहुत उदास
अनहोनी का हो रहा, था सबको आभास।
था सबको आभास, सभी थे चिंतित भारी
क्यों वन में जा रही सुकोमल जनकदुलारी।
कह ‘प्रशांत’ सबने मिलकर उसको समझाया
पर सीता को कोई किंचित डिगा न पाया।।43।।
कैकेयी ने तमककर, दीना मुनि का वेश
राम इन्हें धारण करो, है मेरा आदेश।
है मेरा आदेश, और वन को अब जाओ
राजा की मत सुनो, उन्हें भूलो-बिसराओ।
कह ‘प्रशांत’ राघव ने मुनि का वेश बनाया
सबको कर प्रणाम जंगल का पथ अपनाया।।44।।
राजमहल से निकलकर, पहुंचे गुरु के द्वार
उनके चरणों में किया, नमन अनेकों बार।
नमन अनेकों बार, बढ़े आगे रघुराई
नर-नारी चल रहे साथ, दी उन्हें विदाई।
कह ‘प्रशांत’ तब राजा ने सुमंत्र बुलवाए
और एक रथ उनकी सेवा में भिजवाए।।45।।
तीनों को वन में घुमा, लौटा लाना तात
शायद अब मैं ना बचूं, बतलाना यह बात।
बतलाना यह बात, अगर दोनों ना मानें
दृढ़ प्रतिज्ञ हैं राम-लखन, निश्चय यदि ठानें।
कह ‘प्रशांत’ तब हाथ जोड़कर विनती करना
वन के कष्ट बता सीता को लौटा लाना।।46।।
अवधपुरी को सिर झुका, रथ में बैठे राम
चारों दिश मानो मचा, था भीषण कुहराम।
था भीषण कुहराम, पेड़-पौधे कुम्हलाए
विरह अग्नि ने सब नदियां-तालाब सुखाए।
कह ‘प्रशांत’ पशु-पक्षी भूले खाना-पीना
बनी भूत सी नगरी, क्या मरना क्या जीना।।47।।
पहले दिन रघुनाथजी, पहुंचे तमसा तीर
वहीं किये विश्राम सब, पाया भोजन-नीर।
पाया भोजन-नीर, साथ में जनता आयी
वहीं रहेंगे हम भी, जहां राम रघुराई।
कह ‘प्रशांत’ पर चले रात में ही वे आगे
छूटे अवधपुरी के वासी वहीं अभागे।।48।।
शृंगवेरपुर पहुंच कर, दर्शन पूजन-स्नान
गंगा में सबने किया, गायब हुई थकान।
गायब हुई थकान, राम ने महिमा गाई
स्वर्गलोक की नदी धरा पर कैसे आयी।
कह ‘प्रशांत’ राजा निषाद गुह सुनकर धाये
कंद मूल-फल भेंट सहित दर्शन को आये।।49।।
मेरा घर पावन करें, वहीं करें विश्राम
सेवा जो संभव हुई, पूर्ण करूंगा राम।
पूर्ण करूंगा राम, पास बैठाकर उसको
राघव बोले मगर हुई है आज्ञा मुझको।
कह ‘प्रशांत’ उसका मुझको पालन है करना
पूरे चैदह साल वनों में ही है रहना।।50।।
– विजय कुमार

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