सुप्रीम कोर्ट ने कहा: मीडिया का एक सेक्शन हर घटना को कम्युनल एंगल दे रहा, आखिर में इससे देश का नाम खराब होता है

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नई दिल्ली2 मिनट पहले

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चीफ जस्टिस ने कहा कि ऐसा लगता है कि वेब पोर्टल पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। वो जो चाहे चलाते हैं। उनकी कोई जवाबदेही भी नहीं है। वे हमें कभी जवाब नहीं देते।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मीडिया के एक सेक्शन में कम्युनल टोन में रिपोर्टिंग को लेकर कड़ी नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की रिपोर्ट्स से देश का नाम खराब हो सकता है। कोर्ट ने पिछले साल दिल्ली में तबलीगी जमात की गैदरिंग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। चीफ जस्टिस NV रमना ने कहा कि समस्या यह है कि मीडिया का एक सेक्शन देश में हर एक घटना को कम्युनल एंगल से दिखा रहा है। आखिरकार इससे देश का नाम ही खराब होगा।

अदालत ने सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे फेक न्यूज को लेकर चिंता जताई। साथ ही वेब पोर्टल की जवाबदेही को लेकर भी टिप्पणी की। रमना की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि वेब पोर्टल पर किसी का नियंत्रण नहीं है। हर खबर को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश हो रही है, जो कि एक बड़ी समस्या है।

ट्विटर, FB और यूट्यूब जजों को जवाब नहीं देते
चीफ जस्टिस ने कहा कि ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जजों को जवाब नहीं देते हैं और बिना किसी जवाबदेही के संस्थानों के खिलाफ लिखते हैं। वेब पोर्टलों और YouTube चैनलों पर फर्जी खबरों को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। अगर आप यूट्यूब पर जाएंगे तो पाएंगे कि कैसे फर्जी खबरें खुलेआम सर्कुलेट हो रही हैं। कोई भी यूट्यूब पर चैनल शुरू कर सकता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की ओर से कार्रवाई नहीं होती
रमना ने कहा कि लोगों के लिए तो भूल जाओ, वे संस्थान और जजों के लिए भी कुछ भी मनमाना लिखते रहते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने कभी फेसबुक, ट्विटर और यू ट्यूब द्वारा कार्यवाही होते नहीं देखी। वो जवाबदेह नहीं हैं, वो कहते हैं कि ये हमारा अधिकार है। वे केवल शक्तिशाली लोगों को ही जवाब देते हैं।

तुषार मेहता बोले- नए IT रूल्स से रेग्युलेट करने की कोशिश जारी
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को जवाब दिया कि नए IT रूल्स सोशल और डिजिटल मीडिया को रेग्युलेट करने के लिए बनाए गए हैं और रेग्युलेट करने का प्रयास जारी है। उन्होंने कोर्ट से गुहार लगाई कि अलग-अलग हाईकोर्ट में IT रूल्स को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर किया जाए। अलग-अलग हाईकोर्ट अलग-अलग आदेश पारित कर रहे हैं। ये मामला पूरे भारत का है, ऐसे में एक समग्र तस्वीर देखने की जरूरत है।

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